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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तास्तु तामाय़तापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वनाः |  ४६   क
तर्जय़न्ति सदा रौद्राः परुषव्यञ्जनाक्षराः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति