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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
न त्वन्यमभिगच्छेय़ं पुमांसं राघवादृते |  ५१   क
इति जानीत सत्यं मे क्रिय़तां यदनन्तरम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति