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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी |  ५३   क
सान्त्वय़ामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रिय़वादिनी ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति