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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
नले चेहागते विप्र भूय़ो दास्यामि ते वसु |  १८   क
त्वय़ा हि मे वहु कृतं यथा नान्यः करिष्यति |  १८   ख
यद्भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति