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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः |  ५५   क
स रामस्य हितान्वेषी त्वदर्थे हि स मावदत् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति