वन पर्व  अध्याय २६४

मार्कण्डेय़ उवाच

शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् |  ५९   क
न शक्तो विवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रिय़ः ||  ५९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति