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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
निराशाश्च जय़े तस्मिन्हते शल्ये महारथे |  ७   क
हतप्रवीरा विध्वस्ता विकृत्ताश्च शितैः शरैः |  ७   ख
मद्रराजे हते राजन्योधास्ते प्राद्रवन्भय़ात् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति