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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः |  ६२   क
स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भय़वर्धनः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति