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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णादय़श्चेमे नग्नाः पतितमूर्धजाः |  ६५   क
कृष्यन्ते दक्षिणामाशां रक्तमाल्यानुलेपनाः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति