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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दीनान्पशून्दृष्ट्वा ऋषय़स्ते तपोधनाः |  १२   क
ऊचुः शक्रं समागम्य नाय़ं यज्ञविधिः शुभः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति