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शान्ति पर्व
अध्याय २६५
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भीष्म उवाच
सोऽथ धर्मादवाप्तेषु धनेषु कुरुते मनः |  १५   क
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति