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शान्ति पर्व
अध्याय २६५
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भीष्म उवाच
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् |  १६   क
स मित्रधनलाभात्तु प्रेत्य चेह च नन्दति ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति