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शान्ति पर्व
अध्याय २६५
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भीष्म उवाच
शव्दे स्पर्शे तथा रूपे रसे गन्धे च भारत |  १७   क
प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत्फलं विदुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति