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शान्ति पर्व
अध्याय २६५
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भीष्म उवाच
स धर्मस्य फलं लव्ध्वा न तृप्यति युधिष्ठिर |  १८   क
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति