वन पर्व  अध्याय २६५

मार्कण्डेय़ उवाच

ततो मे त्रिगुणा यक्षा ये मद्वचनकारिणः |  १२   क
केचिदेव धनाध्यक्षं भ्रातरं मे समाश्रिताः ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति