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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तद्भद्रसुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम् |  २०   क
परदारास्म्यलभ्या च सततं च पतिव्रता ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति