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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्रारुदत्सीता कम्पय़न्ती पय़ोधरौ |  २४   क
शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्य वाससा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति