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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसगणेश्वरः |  २९   क
तत्रैवान्तर्हितो भूत्वा जगामाभिमतां दिशम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति