वन पर्व  अध्याय २६५

मार्कण्डेय़ उवाच

स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतः |  ७   क
इदमित्यव्रवीद्वालां त्रस्तां रौहीमिवावलाम् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति