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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यो ह्यग्निरुखाप्यन्या नित्यमेवमवैहि भोः |  १६   क
न चोपलिप्यते सोऽग्निरुखासंस्पर्शनेन वै ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति