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कर्ण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
रथस्थः स तय़ा विद्धो वर्म भित्त्वा महाहवे |  ३०   क
भृशं संविग्नहृदय़ः पपात च मुमोह च ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति