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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्तो लक्ष्मणो भ्रात्रा गुरुवाक्यहिते रतः |  १२   क
प्रतस्थे रुचिरं गृह्य समार्गणगुणं धनुः |  १२   ख
किष्किन्धाद्वारमासाद्य प्रविवेशानिवारितः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति