वन पर्व  अध्याय २६६

मार्कण्डेय़ उवाच

सभृत्यदारो राजेन्द्र सुग्रीवो वानराधिपः |  १५   क
इदमाह वचः प्रीतो लक्ष्मणं नरकुञ्जरम् ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति