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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं वानरेन्द्रास्ते समाजग्मुः सहस्रशः |  २२   क
दिशस्तिस्रो विचित्याथ न तु ये दक्षिणां गताः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति