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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
आचख्युस्ते तु रामाय़ महीं सागरमेखलाम् |  २३   क
विचितां न तु वैदेह्या दर्शनं रावणस्य वा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति