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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षितं वालिना यत्तत्स्फीतं मधुवनं महत् |  २६   क
त्वय़ा च प्लवगश्रेष्ठ तद्भुङ्क्ते पवनात्मजः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति