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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां तं प्रणय़ं श्रुत्वा मेने स कृतकृत्यताम् |  २८   क
कृतार्थानां हि भृत्यानामेतद्भवति चेष्टितम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति