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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः |  ३१   क
अगमत्प्रत्ययं भूय़ो दृष्टा सीतेति भारत ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति