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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपि राज्यमय़ोध्याय़ां कारय़िष्याम्यहं पुनः |  ३४   क
निहत्य समरे शत्रूनाहृत्य जनकात्मजाम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति