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कर्ण पर्व
अध्याय ३१
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शल्य उवाच
इति संवदतोरेव तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |  ६८   क
ते सेने समसज्जेतां गङ्गाय़मुनवद्भृशम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति