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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः पर्वतशृङ्गाभं घोररूपं भय़ावहम् |  ४६   क
पक्षिणं दृष्टवन्तः स्म वैनतेय़मिवापरम् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति