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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छ लक्ष्मण जानीहि किष्किन्धाय़ां कपीश्वरम् |  ५   क
प्रमत्तं ग्राम्यधर्मेषु कृतघ्नं स्वार्थपण्डितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति