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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
स सम्पातिस्तदा राजञ्श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |  ५१   क
विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिन्दम ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति