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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्याहं सर्वमेवैतं भवतो व्यसनागमम् |  ५३   क
प्राय़ोपवेशने चैव हेतुं विस्तरतोऽव्रुवम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति