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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽस्मानुत्थापय़ामास वाक्येनानेन पक्षिराट् |  ५४   क
रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति