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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे |  ५५   क
भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति