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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महाय़ुधैः |  ३५   क
क्षणेन व्यद्रवत्सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति