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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र सीता मय़ा दृष्टा रावणान्तःपुरे सती |  ५८   क
उपवासतपःशीला भर्तृदर्शनलालसा |  ५८   ख
जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति