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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशां पते |  ३०   क
अन्योन्यमभितो राजन्क्रूरमाय़ोधनं वभौ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति