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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रावय़ित्वा तदात्मानं ततो दग्ध्वा च तां पुरीम् |  ६८   क
सम्प्राप्त इति तं रामः प्रिय़वादिनमर्चय़त् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति