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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदर्थं निहतो वाली मय़ा रघुकुलोद्वह |  ७   क
त्वय़ा सह महावाहो किष्किन्धोपवने तदा ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति