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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमास्थाय़ पाञ्चाल्योऽन्यच्च कार्मुकम् |  ६४   क
आदाय़ कर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या नदन्रणे ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति