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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः शरीरात्स्कन्दस्य पुरुषः काञ्चनप्रभः |  २४   क
भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महावलः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति