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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
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भीष्म उवाच
अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात् |  ४५   क
भय़ं हि शङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति