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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी व्राह्मणं व्यपहाय़ तम् |  १०   क
पाद्यमाचमनीय़ं च ददौ भर्त्रे तथासनम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति