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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वशः |  १४   क
तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति