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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
वद्धगोधाङ्गुलित्राणौ राघवौ तत्र रेजतुः |  १७   क
वृतौ हरिमहामात्रैश्चन्द्रसूर्यौ ग्रहैरिव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति