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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवभौ हरिसैन्यं तच्छालतालशिलाय़ुधम् |  १८   क
सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदय़ं प्रति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति