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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
विधिवत्सुप्रशस्तेषु वहुमूलफलेषु च |  २०   क
प्रभूतमधुमांसेषु वारिमत्सु शिवेषु च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति