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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
निवसन्ती निरावाधा तथैव गिरिसानुषु |  २१   क
उपाय़ाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति