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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपाय़ः को नु भवतां मतः सागरलङ्घने |  २४   क
इय़ं च महती सेना सागरश्चापि दुस्तरः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति